नेवर कंपेयर

हे पुरूष ! तुम ने आज हर क्षेत्र में अपने पांव पसार लिए हैं ।पठन पाठन/ शिक्षण से लेकर राजनीति तक, खेलकूद से लेकर अभिनय तक, युद्ध क्षेत्र से लेकर अंतरिक्ष यात्रा तक हर क्षेत्र में तुमने अपने झंडे गाड़े हैं। हम उस पौरूष शक्ति का बखान करने में असमर्थ हैं , जिसने हर दिन अपना परिचय स्वयं ही दिया है । आज पुरूष महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने लगे हैं । दफ्तर के काम काज से लेकर रसोई में पाककला , किसी भी क्षेत्र में वह महिलाओं से पीछे नहीं है ।
समस्त पुरूषों को इस सफलता की बधाई ।

ऊपर लिखी पंक्तियां आपको अटपटी लगी होंगी पुरुषों को तो यह अपमानजनक भी लगा होगा।
माफ कीजिएगा यहां मैं किसी का अपमान नहीं कर रही परंतु आज आप सब यही कर रहे हैं । तो सोचिए महिलाओं को कैसा महसूस होता होगा जब आप इसी तरह उनकी उपलब्धियां गिनाते हैं , उन्हें बधाई देते हैं.

आप महिलाओं को बधाई देते हैं कि उसने हर क्षेत्र में सफलता हासिल कर ली है ।मगर इसमें बधाई देने वाली कौन सी बात है? वह सफलता हासिल क्यों नहीं कर सकती ? क्या आप उसे इतना कमजोर मानते हैं कि आज अगर महिलाऐं हर क्षेत्र में सफल हो रही हैं तो आपको आश्चर्य हो रहा है ? और अगर आप महिलाओं को इन सफलताओं की बधाई देते हैं तो समस्त पुरूष जाति को भी बधाई ।

सबसे हास्यास्पद तो यह है कि कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो महिलाओं को बधाई देते हैं कि वो एक बेटी है , एक पत्नी है , एक माँ है । मगर यह तो जाहिर सी बात है कि स्त्रीलिंग रिश्तों में एक स्त्री ही हो सकती है । आप क्या चाहते हैं कि आप एक पुरूष होकर किसी की पत्नी बनें । और अगर आप एक स्त्री को बेटी , पत्नी , माँ होने की बधाई देते हैं तो आप सभी पुरूषों को भी बधाई है कि वो पुल्लिंग है।

महिलाओं को बधाईयाँ दी जा रही हैं कि वो किसी को जन्म देती हैं । मगर क्या यह महिलाओं की उपलब्धि है? ईश्वर ने महिलाओं की शारीरिक संरचना ही ऐसे की है कि वह 9 महिने अपनी कोख में शिशु को पाल सके , किन्तु किसी को जन्म देना महिला के अकेले बस में नहीं । प्रजनन में स्त्री पुरूष दोनों भागीदार होते हैं । तो पुरूषों को भी इस कार्य को करने की क्षमता रखने के लिऐ बधाईयाँ मिलनी चाहिऐ ?

महिलाओं को हम किस उपलब्धि की बधाईयाँ देते हैं ? महिलाऐं खुद किस गुमान में हैं ? जो कुछ भी आज महिलाऐं कर के दिखा रही हैं जिन्हें लोग नारी शक्ति कहते हैं ये सारी शक्तियाँ उस नारी में ईश्वर द्वारा ही प्रदान की गई हैं। हर नर नारी ये सारे काम करने में हमेशा से सक्षम रहे हैं । आगे वह और भी विविध क्षेत्र में कार्य करेंगे जिसकी कल्पना भी हम मनुष्य अभी नहीं कर सकते हैं ।

आज एक स्त्री यदि घर के साथ दफ्तर भी संभालती है, अगर आज वो अपने पैरों पर खड़ी है, अगर आज वो एक मां होने के साथ-साथ एक पिता होने का दायित्व भी उठा लेती है ,तो इसमें यह कतई नहीं है कि वह पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला रही है। बल्की ऐसा इसलिए है कि उसे आज आवश्यकता है, उसे आवश्यकता है कि आज वह अकेले ही सब संभाल पाए । मैं पूछती हूं आज कोई पुरुष यदि अकेला रहे ; घर में स्त्री के ना होने से, क्या वह भूखा ही रहेगा ? या जरूरत पड़ने पर वह खुद से खाना पकाएगा ? यदि एक पुरुष लैपटॉप पर उंगलियां चलाने के साथ-साथ, दफ्तर में कलम चलाने के साथ-साथ कुकर की सीटी लगाना भी जानता है कढ़ाई और कलछुल पकड़ना भी जानता है ; तो क्या एक महिला जरूरत पड़ने पर रसोई के साथ दफ्तर नहीं संभाल सकती? इसके लिए किस बात की बधाई?

यदि हम सचमुच महिला का सम्मान करते हैं तो बार-बार उसकी तुलना पुरुषों से क्यों की जाती है ? स्त्री पुरुष दोनों ईश्वर द्वारा बनाए गए हैं दोनों ही अपने आप में अलौकिक रचनाएँ हैं , दोनों की तुलना व्यर्थ है। माना कि दोनों की शारीरिक संरचना अलग-अलग है मगर यह उसकी ताकत है उसकी खुबसूरती है, कमजोरी नहीं।

महिला का सम्मान करने के लिए उसके गुणों का बखान करने की जरूरत नहीं है, उसे लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा -काली जैसी देवी कहने की जरूरत नहीं है, उसे विशेष स्थान प्रदान करने की जरूरत नहीं है, उसे आरक्षण प्रदान करने की जरूरत नहीं है, महिलाओं को पुरुषों जैसा बनाने की जरूरत नहीं है। महिलाएं इंसान है , महिलाओं के साथ इंसान जैसा बर्ताव किया जाए , महिलाएं महिलाएं है उन्हें महिलाएं ही बने रहने दे। और जिस दिन हम सभी यह बात समझ जाएंगे उस दिन शायद महिला दिवस मनाने की ज़रूरत भी ना पड़े.

#मनिषाझा