अंतिम साँस तक प्रयास करना ही जिंदगी है 

My younger brother saurabh jha , student of std 10 wrote his first blog . I want to post it here . 

अगर मुझसे ‘जिंदगी’ की कोई परिभाषा पुछे तो यही कहुँगा कि निराशा का सामना अपने अंदर पनपती हुई एक आशा के साथ करना ही जिंदगी ह। अपने अंदर की एक छोटी सी किरण का साथ लेकर बाहर के सूर्य को मात देना ही जिंदगी है । आसान शब्दों में कहा जाए तो प्रयासरत होकर किसी फौजी की तरह अंतिम  साँस तक लड़ते रहना , ही जिंदगी है ।

यूँ तो जिंदगी कहें तो यह एक बहुत छोटा सा शब्द लगता है किसी भी इंसान का जीवनकाल मात्र, परंतु इसकी परिभाषा बहुत बड़ी है । 

यह वही जिंदगी है जो रंको को राजा बना देती है और राजाओं को रंक। जो किसी पर्वत को मिट्टी बना देती है और कभी मिट्टी को पर्वत । यह जिंदगी ही है जो बर्फीली पहाड़ी को सागर और सागर को बर्फ बना देती है । 

शरारतों से शूरू हुई ये जिंदगी जो जवानी से सीख ले कर बुढ़ापे की ओर ढलती है इसमें कई उतार चढाव है  जो कभी हमें भगाती है कभी हमें गिराती है मगर रूकने नहीं देती । 

मैं अपने अनुभव से कहूँ तो , हमारी जिंदगी किसी  देश के उस सैनिक की तरह हैं जो यह जानते हुऐ कि वह अपने दुश्मनों के आगे काफी कमजोर है , उसका विरोधी देश उसके आगे काफी मजबुत है , वह फिर भी लड़ता है 

हमारे आगे भी ऐसी कई प्रतिकुल परिस्थितियाँ आती है जो हमें हराने के लिऐ काफी बड़ी होती है मगर हम फिर भी लड़ते हैं और यही जिंदगी है । अगर हम लड़े ही नहीं तो जितेंगे तो कभी भी नहीं । 

जीवन में अगर कभी किसी सफल व्यक्ति को देखो तो इतना जरूर समझना कि उसमें कुछ ऐसे विशिष्ट गुण है जो उसे दुसरों से अलग करती है उसमें लड़ के जीतने का वो जज्बा है जो सब के पास नहीं होता , वरना विरोधी उसे भी कब का हरा देते । 

अब गौर करने की बात यह भी है कि इस संसार में  विशिष्ट गुण सभी के पास होते हैं जरूरत होती है तो बस जज्बे की , और अपने गुण को एक निखार देने की । फौज में भी एक सैनिक की भर्ती प्रशिक्षण के बाद ही ली जाती है , प्रशिक्षण एवं लगातार प्रयास हमारे गुणों को निखारने में कारक होता है। 

इसलिए जिंदगी का सही अर्थ है कि हमें हर उम्मीद हर साँस के साथ प्रयासरत होना चाहिए। यहाँ डरपोकों की कोई अहमियत ही नहीं , यहाँ हर किसी को लड़ना होता है ।

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।


#सौरभझा

4 thoughts on “अंतिम साँस तक प्रयास करना ही जिंदगी है 

  1. हमारी सामाजिक अवधारणा में, सामान्य जन को स्वयं को अकिंचन ही मानना चाहिये …. वह ऐसी ही नसीहतों के साथ वयस्क होता है जिससे अधिकांशत: सामान्य जन स्वयं की क्षमता को खोजने , जानने , पहचानने मानने और अपनाने से स्थाई असहमति रखने लगता है… जबकि हर एक की अनंत क्षमतायें उसकी अंतरात्मा / आत्मबल के रूप में उसके भीतर ही उपस्थित होता है…!

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