चिराग तले अंधेरा

एक दीपक जो अंधेर कमरे को रोशन करने में सक्षम होता है ,  उसके खुद के तले में हमेशा अंधेरा ही रहता है । वह चारों दिशाओं को प्रज्जवलित करता है ,  मगर खुद के तले के अंधकार को नहीं मिटा पाता । जितनी बड़ी दीपक की लौ होती है , उसके तले अंधेरा उतना ही घना होता है . 

उसी तरह एक मनुष्य जो दुसरों को खुशियाँ बाँटता है,  बहुधा वो अपने परिवार ,अपने आप को खुशियाँ नहीं दे पाता । जो दुसरों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाता है , उसके खुद के घर में मुस्कुराहट लाने के लिए कोई भी नहीं होता।

दीपक यदि खुद के तले को रोशन करने लगे तो शायद  वो खुद रोशन ना रह पाये । मगर मनुष्यों के साथ ऐसा नहीं है , प्रत्येक मनुष्य का पहला कर्तव्य है कि वो अपने परिवार को उन्नत बनाऐ । अपना घर , अपना मन सबसे पहले रोशन करे । सबसे पहले अपने घर के सदस्यों  के चेहरे पर मुस्कुराहट लाए , यही एक मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है ।

आप कितने अच्छे व्यक्ति हैं इसका पता इस से कतई नहीं चलता कि आप कितने लोगों के काम आ पाए बल्कि इस से चलता है कि जब आपके अपनों को आपकी जरूरत थी तब आप साथ थे या नहीं ।

भगवान ने इस संसार में हमें सिर्फ इतना दायित्व दिया है , यही हमारा कर्म मात्र है कि हम अपने माता-पिता एवं यदि  स्त्री हैं तो अपने स्वामी , यदि पुरूष हैं तो अपनी स्त्री (जिन्हें हमने ईश्वर को साक्षी मान के ग्रहण किया है ) ,  एवं अपनी संतान , अपने भाई- बहन के प्रति हर कर्तव्य पुरा कर सकें । हम उनकी हर जरूरतों को पुरा कर सकें,  उनके चेहरे पर हर क्षण मुस्कुराहट बरकरार रख सकें ।

 अगर एक मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन कर लेता है तो उसका यह जीवन सफल माना जाता है ।
मनिषा झा

गलतियाँ

हाँ ! सच में मेरी गलतियाँ तुम्हारी गलतियों से ज्यादा है । मगर यह भी सच है कि तुम्हारी गलतियों ने ही मेरी गलतियों को जन्म दिया है।

तुमने गलतियों का जो बीज बोया था , उसी बीज से पनपी थी मेरी गलतियाँ और देखते ही देखते मेरी गलतियों का एक बड़ा सा वृक्ष खड़ा हो गया . 

और इस वृक्ष को गिराने के लिऐ काटनी होंगी इनकी जड़े। 

अभी भी समय है तुम सुधार लो अपनी गलतियों को ताकि मैं अपनी गलतियाँ सुधार पाऊँ। 
मनिषा झा

​मृत माता पिता को बेटियाँ क्यूँ नहीं दे सकती मुखाग्नि ? – एक बड़ा सवाल।

​मृत माता पिता को बेटियाँ क्यूँ नहीं दे सकती मुखाग्नि ? – एक बड़ा सवाल।

प्रिया और नेहा डाॅ चंद्रा की बेटियाँ , जिन्होंने डाॅ चंद्रा को कभी बेटे की कमी खलने नहीं दी थी ; आज कुछ भी कर पाने में नाकाम थीं। डाॅ चंद्रा जिन्हें कोई बेटा नहीं था  मगर उनकी बेटियाँ बेटों से जरा भी कम नहीं थी , उनकी बेटियों ने हमेशा बेटों की तरह घर की सारी जिम्मेदारी बखुबी निभाई थी। मगर आज डाॅ चंद्रा के निधन होने पर वही दोनों बेटियाँ दुसरों का मुँह ताकने के लिए मजबूर थी ; वे दोनों लोगों से अनुनय -विनय कर रही थी कि उनके पिता के पार्थिव शरीर को कोई मुखाग्नि दे दे, कोई उनके पिता का अंतिम संस्कार पुरा कर दे। डाॅ चंद्रा का देहांत हुए पुरा एक दिन होने जा रहा था और अब तक उन्हें ऐसा कोई नहीं मिल पाया था जो लाश को मुखाग्नि देता।  भला आज के जमाने में किसी को अपने माता-पिता का दायित्व वहन करना ही भार मालुम होता है , किसी और के लिए कोई क्यूँ करे ? आज डाॅ चंद्रा की मजबूर  बेटियों के मन में एक बड़ा सवाल था – आखिर अपने पिता के पार्थिव शरीर को वे मुखाग्नि क्यूँ नहीं दे सकती ?

आज यह सवाल मेरे मन में भी है । हम आज भी इतने मजबूर क्यों हैं  ? 
इस 21वीं शताब्दी में जहाँ हम एक ओर स्त्री – पुरूष के बराबरी की बात करते हैं  , वहीं दुसरी ओर हम इतने लाचार इतने मजबूर कैसे हो जाते हैं ? जहाँ आज बेटियाँ बेटों की तरह अकेले  ताउम्र घर की सारी जिम्मेदारियाँ उठाती हैं वहीं उसे माता पिता की अर्थी को कंधा देने के लिए समाज के पुरूषों का सहारा लेना पड़ता है,  क्यूँ? 
जहाँ एक ओर देश में आज भ्रूण हत्या के खिलाफ व्यापक आंदोलन छिड़ा है , हम बेटियों के जन्म को समर्थन दे रहे हैं , वहीं दुसरी ओर आज भी हम उन कुप्रथाओं का पालन कर रहे हैं जहाँ माता पिता का अंतिम संस्कार सिर्फ बेटे ही कर सकते हैं । ऐसा क्यूँ?
ये कितने दुर्भाग्य की बात है कि आज भी इन सवालों का हमारे पास कोई सटीक उत्तर नहीं है । 

मनिषा झा। 

लिंग भेदभाव -एक गलत नजरिया 

लिंग भेदभाव -एक गलत नजरिया 


 
खराब नजरिया का कोई ईलाज नहीं है । हमारा देश 21 वीं सदी में काफी तरक्की कर रहा है और एक मजबूत स्वतंत्र राष्ट्र बनने को तैयार हो रहा है। मगरआज भी हमारा देश खराब नजरिऐ की बीमारी से जुझ रहा है । जी हाँ ! लिंग भेदभाव का जो खराब नजरिया देश में सर्वव्याप्त है वो देश के लिए एक गंभीर बिमारी है। कुछ प्रतिशत लोग मानते हैं कि आज हम बहुत हद तक इस से उबर चुके हैं आज हमारे देश में लड़कियाँ भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं , देश विदेश घुम रही हैं , लड़कों के साथ उठ बैठ रही हैं लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं और क्या चाहिए।

तो उन्ही कुछ प्रतिशत लोगों से मेरा सवाल यह है कि क्या इतना ही जरूरी है ? अगर हम सचमुच इस गंभीर बिमारी से उबर चुके हैं तो आज भी बंदिशे लड़कियों पर ही क्यूँ लगाई जा रही है ? क्यूँ आज भी ऐसी खबरें देखने को मिलती है कि फलाँ जिले में लड़कियों को जिंस पहनने पे मनाही , फलाँ जिले में लड़कियाँ फोन नहीं इस्तेमाल कर सकती है ।
बात यह है कि सिर्फ ये जरूरी नहीं की हम लड़कियों को उसके मौलिक अधिकार , जिससे वो सदियों तक वंचित रही है,उसे दे रहे हैं ; बल्कि जरूरी यह है कि हम लड़कियों को लड़को के बराबर समझे कोई भी नियम जो लड़कियों के लिऐ बनाऐ गये हों वो लड़कों पर भी लागू हों।
आज एक लड़का खुले बदन पुरे शहर घुम लें किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता मगर आज एक लड़की का दुपट्टा गिर जाऐ तो सौ उंगलियाँ उस तरफ उठती है । ऐसा क्यूँ?
इसे कुछ इस तरह से समझा जाए कि भगवान ने ही लड़के लड़कियाँ दोनो को बनाया है, दोनों की शारिरिक संरचना भले ही अलग है मगर उनमें कोई भी भेदभाव नहीं है । दोनों समान रूप से जन्म लेते हैं बड़े होते हैं । दोनों ही जवान होते हैं । दोनों में ही विपरित लिंग के प्रति आकर्षण होता है , उत्तेजना होती है ।
मगर जब परदे की बात आती है तो सिर्फ लड़कियाँ ही परदा करती है।
क्या कभी आपने ये सोचा है कि कम वस्त्र में लड़कियों को देख के लड़के बहक सकते हैं उसी तरह कम वस्त्र में लड़को को देख कर लड़कियाँ भी बहक सकती हैं और इसलिए लड़के भी लड़कियों से परदा करें।
लड़कियाँ तो अपने घर में भी परदा करती है पिता से, भाई से। मगर कितने पुरूष अपनी बेटियों , बहनों से परदा करते होंगे ।
अगर कोई लड़की किसी लड़के से छेड़ी गई तो उस स्थिति में भी लड़की ही बदनाम होती है और लड़की के घरवालों को ये चिंता सताने लगती है कि उनकी ईज्जत पर दाग ना लग जाऐ।
मगर ईज्जत का पैमाना शरीर से नहीं कर्म से होता है।
कुछ लोगों ने ऐसी दलील दे रखी है समाज में कि स्त्री अगर किसी के द्वारा छुई गई तो उसकी ईज्जत चली जाएगी , वो कुँवारी नहीं रह जाएगी ।मगर मेडिकल साइंस ऐसी हर बातों को गलत साबित करता है । अगर कुँवारापन ईज्जत है तो किसी को छुने से या किसी के द्वारा छुने जाने से किसी भी तरीके से शारीरिक संबंध बनने पर स्त्री या पुरूष दोनों का कुँवारापन नष्ट होता है ;नहीं तो स्त्री कुँवारी है या नहीं इसका कोई माप नहीं है । ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि स्त्रियों की शारिरिक बनाबट ऐसी है कि उनका यौण शोषण , बलात्कार हो सके ; यौण शोषण पुरूषों का भी होता है , पुरूष भी बलात्कार के शिकार हो सकते हैं।
हमारे समाज में हम औरतों को लाख परदे में रखते हैं तो भी हमारे समाज की स्त्रियाँ बलात्कार की शिकार होती है ; क्यूँकि हमने पुरूषों को बेपरवाह घुमने के लिऐ रख छोड़ा है ।
बात बस इतनी सी है जितनी बंदिशे , जितने नियम कानून हम स्त्रियों पर लगाते हैं अगर उसका कुछ प्रतिशत नियम पुरूषों पर भी लगाया जाऐ तब ही लिंग भेदभाव की बिमारी पर काबू पाया जा सकेगा । और तब जा के ही भारत सही मायने में तरक्की कर सकेगा।

मनिषा झा।

व्यंग

जरा सोचें पशू-पक्षियों का भी तो कोई मजहब होता होगा । उन्हें भी तो उस ईश्वर का शुक्रिया अदा करना होता होगा जिसने उन्हें जीवन दिया है।
परंतु उनका मजहब क्या है? वो अल्लाह के बंदे हैं या भगवान श्रीहरि के?
कौन से पशू को किस ईश्वर ने बना के धरती पर भेजा होगा?
जरा गौर करें तो हमें लगेगा कि पक्षियों का सुबह सुबह का कलरव मानो कोई पादरी मंत्रो का पाठो कर रहा हो। कभी झिंगुरो की झृंकार लगती है कि कोई समुह में आरती हो रही है। मुर्गों की बाँग ऐसी जैसे वो नमाज अदा कर रहे हों।
तो क्या पक्षियाँ सिक्ख /ईसाई हैं , झिंगुरे हिंदू धर्म अनुयायी और मुर्गा इस्लाम माननेवाला है?
फिर इनके वो स्थान कहाँ है जहाँ इनके ईश्वर रहते हैं।
कहाँ है पक्षियों का गुरूद्वारा जहाँ मत्था टेकते हैं, या उनका चर्च जहाँ वो ईसु को कैंडल जलाते होंगे।? कहाँ है झिंगूरों का मंदिर जिसमें फूल अक्षत धूप-दीप ले के भगवान की पूजा की जाती होगी?कहाँ है मुर्गों का मसजिद?
क्या इन सब में भी मजहब को ले के दंगे होते होंगे?
जब झिंगूरें आरती कर रही होंगी उसी वक्त यदि बगल में मुर्गे नमाज पढ़ने लगें तब तो दंगा होना निश्चित हो जाता होगा।
और अगर मुर्गों के मस्जिद के जगह झिंगुरों के देवता का जन्म हुआ हो तो फिर ?
ऐसी कल्पना मात्र भी असंभव लगती है मुझे तो । आप सब को भी ऐसा ही लग रहा होगा।
क्युँकि पशु-पक्षियों का पेड़ पौधों का कोई मजहब नहीं होता।
मजहब इंसानो के बनाऐ हुए हैं, मनुष्य की दिमाग की उपज हैं ये, मनुष्यों ने मजहब बनाया उसके नियम काएदे बनाऐ और उसके अनुसार खुद को बाँट लिया।
पशु-पक्षी भी , पेड़ पौधे भी उस ईश्वर का शुक्रिया जरूर अदा करते होंगे जिसने सबको बनाया है। मगर मजहब बना कर नहीं । और इसलिऐ शायद उनमें दंगे नहीं होते और आपसी सौहार्द बना हुआ है।

मनिषा झा

( उपयुक्त सभी पंक्तियाँ सिर्फ एक व्यंग है। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म ,समुदाय ,भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। व्यंग में झिंगुर,मुर्गे , एवं पक्षियों का उदाहरण केवल मनोरंजन के दृष्टिकोण से किया गया है। कृपया इसे अन्यथा ना लिया जाऐ ।
यदि किसी को भी इस पोस्ट से कोई आपत्ति हो तो ,मैं क्षमा चाहती हूँ, कृपया सुचित करें। )

सब कुछ लुटाकर भी ,

सबकुछ लुटा कर भी, कुछ गुमान अभी बाकी है
साँसें ढलती सी- ही, कुछ जान अभी बाकी है
सपने सारे चूर हो गये, उम्मीदों को बुझा
दिया
दिल के किसी कोने में सही , कुछ अरमान अभी
बाकी है
मन के स्वच्छंद उन्मत पंछी को कैद कर दिया
पिंजरे में
पंख सारे काट कर देख लो, कुछ उड़ान अभी
बाकी है
नाम भी गूमा दो तुम, चेहरा भी बदल डालो
मगर शहर के बाजार में , कुछ पहचान अभी बाकी
है
इतनी जल्दी क्या है जाने की, काम अधूरे रह गये
बहुत कुछ तो चूका लिया, कुछ एहसान अभी
बाकी है
खूद को ना कमजोर करो ऐसे , कि बहती
धारा रूक जाए
तुम तो गहरा सागर हो जिसमें, कुछ तूफान
अभी बाकी है
साँसे ढलती सी-ही , कुछ जान अभी बाकी
है,,,,,,,,।

मनिषा