मगध युनिवर्सिटी में हो रहा छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़

बिहार सरकार एक बार फिर कई हजार छात्र -छात्राओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने पर तुली है । मगध विश्वविद्यालय जो दक्षिणी बिहार में एक मुख्य शैक्षणिक संस्थान बन कर खड़ा है , जिसमें इस क्षेत्र में कई हजार छात्र छात्राओं का नामांकन है ; उस विश्वविद्यालय के 61 काॅलेजों( 28 सामान्य डिग्री काॅलेज) की मान्यता (आधारभूत संरंचनाओं और न्यूनतम कमियों को देखते हुऐ) 2014 में रद्द कर दी जाती है , और कमाल की बात तो ये है कि उसके बाद भी इन 61 काॅलेजों में नामांकन लिया जा रहा होता है ,प्रो वी सी के नेतृत्व एवं निर्देशन में अंगीभूत काॅलेजों से टैग करा के छात्र-छात्राओं की परीक्षाऐं भी ले ली गई , जिसे राज्य सरकार भी अपनी सहमति दे देते हैं । वाह ! ।
अब हुआ ये मान्यता रद्द किऐ गये काॅलेजों कि याचिका पर हाई कोर्ट ने सुनवाई करते हुऐ छात्रों के रिजल्ट पर रोक लगा दी है । अब ऐसे में जो छात्र -छात्राऐं थर्ड ईयर में हैं उनका सेकंड इयर का परिणाम अभी तक घोषित नहीं किया है ।
मगध विश्वविद्यालय में एक तो ऐसे ही सत्र देरी से चल रहा है , जो पार्ट 3 की परीक्षा जुन जुलाई तक ले ली जाती है , वो अब तक नहीं हुई है । देर सवेर विश्वविद्यालय ने एक अक्टुबर से परीक्षा की तिथि घोषित की लेकिन उन 61 काॅलेजों में नामांकित हजारों छात्र छात्राओं का न तो पिछली परीक्षा का परिणाम घोषित किया गया न ही अभी एडमिट कार्ड जारी किया है । हाईकोर्ट के इस फैसले का असर छात्रों को भुगतना पड़ रहा है । सरकार इस बात को कितनी गंभीरता से ले रही है वो तो दिख रहा है ।
सवाल यह उठता है कि जब उन 61 काॅलेजों की मान्यता 2014 में ही रद्द कर दी गई थी तो सरकार ने इसमें नामांकन हेतु अपनी सहमति क्यूँ जताई ?
अब हजारों छात्रों के भविष्य का जिम्मेदार कौन होगा ?
छात्रों में बहुत आक्रोश है । प्रदेश के पटना जिले में जगह जगह प्रदशन किऐ गऐ हैं । तोड़ फोड़ मचाई गई है । इस कारण से विश्वविद्यालय ने 1 अक्टुबर से शुरू होने वाली परीक्षा को स्थगित कर दिया है । 10-12 दिन में नई तिथी की घोषणा की जाऐगी । अब देखना यह है कि 10 -12 दिन में सरकार कौन सा उपाय निकालती है जिससे उन काॅलेजों के छात्र भी सुचारू रूप से परीक्षा दे पाऐं ।
इन सब के कारण शैक्षिक सत्र में काफी देरी हो रही है । 2015 -18 के डिग्री कोर्स के सत्र में पार्ट 3 की परीक्षा ही अब तक नहीं ली गई है । परिणाम घोषित होते होते 2019 आ जाऐगा ।

#मनिषाझा

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ईश्वर की किस्मत

मैं उन दोनों ईश्वरों की भेंट कराना चाहती हूँ ,
एक जिसने बनाया है
गुब्बारे खरीदने वाला बचपन,
और दुसरा वो
जिसने बनाया है गुब्बारे बेचने वाला बचपन ;
मैं देखना चाहती हूँ
ये दोनों ईश्वर कैसे दिखते हैं ?
एक ईश्वर होगा
फटे दरारों वाले खूरदुरे हाथों वाला
दुसरे के हाथ होंगे
सुंदर , कोमल , सफेद ।
मैं चाहती हूँ दोनों ईश्वर मिले
जैसे मिलते हैं
ये बच्चे
और जताते हैं अफसोस अपनी अपनी किस्मत पर ।

#मनिषाझा

मोक्ष

कविताओं का जन्म होता है
कविताऐं पैदा की जाती है
कवियों द्वारा जनी जाती हैं कविताऐं
जैसे कोई माँ जनती है अपना बच्चा
उसे लाखों दुआऐं देती है
लगाती है काला टीका
कि उसकी उमर इतनी लंबी हो
जितनी किसी की होनी संभव न हो

कविताओं को बनाया जाता है
जैसे माँ बनाती है
बिटिया के बाल
मन के भाव
पिरोये जाते है एक एक शब्द में
उसी करीने से
जैसे माँ गुँथती है
चोटियाँ
बाँधी जाती है कविताऐं तुकबंदीयों में
जैसे घर की लड़कियों के लिऐ
तय की जाती है दहलीज

कविताओं को सँवारा जाता है
अलंकृत किया जाता है
जैसे तैयार कि जा रही हो दुल्हन
कहीं मुँह दिखाई के लिऐ
कविताऐं सुंदर होती है

लेकिन मेरे मन के भाव तो
किसी अतृप्त आत्मा सी
भटक रही हैं मन में,
वे बहुत कुरूप हैं ,
अति विकराल रूदन करते हुऐ
वे आजाद हो जाना चाहते हैं
इस सांसारिक बंधन से
वे मृत्यु कि ओर अग्रसर हैं
वे चाहते हैं
वे जो मेरे मन मे पल रहे कब से
अब उनका अंत हो जाऐ
मैं उन्हीं कभी न तृप्त होने वाली
भावनाओं को
आज मोक्ष दिला रही हूँ ।

#मनिषाझा

वे शहर जा रहे थे

वे शहर जा रहे थे ।

गाँव में छोड़ कर ,
छज्जे से टपकता बरसात का पानी ,
जैसे रोती हुई माँ को छोड़
पीहर से लौट जाती है बेटियाँ ,
छोड़ कर जा रहे वो
दरवाजे की सीलन ,
जैसे पिता का दबा दबा सा गम
देख कर भी
मुस्कुराती हुई चली जाती है बेटियाँ,
कहते हुऐ कि अगली बार
फिर आऊँगी ,
वो आँगन में लगी फूलवारी भी
छोड़ कर जा रहे ,
जैसे छोटी बहनों को छोड़ जाती
बड़ी बहनें ,
कह कर कि खिलते रहना ;

अब उनकी जगह ,
दीवारों पर पीपल की जड़ उगा करेंगी ,
घर भरा होगा मकड़ी के जाले से
आंगन के पिछले कमरे में
बने रोशनदान पर
गौरेयै का एक जोड़ा घोसला बनाएगा ,
अलमारी में रखी किताबों पर
दीमकें घर बनाऐगी ;
जैसे बेटीयों के ससुराल जाते ही
उनकी जगह
एक वाशिंग मशीन आ जाती है ,
और एक नौकरानी भी ,
बच्चों को पढाने के लिऐ
आ जाते हैं ट्यूशन टीचर्स ,
बूढी माँ को देखने के लिऐ
बुला ली जाती है नर्स ;

बेटियों को ससुराल जाना ही है
पीहर को छोड़
अपनी दुनिया बसानी होगी ;
अपनी दुनिया बसाने
वे शहर जा रहे थे ।

#मनिषाझा

औरत नाप लेती है , कमोबेस सबकुछ

एक औरत के नाप से चलती है ये दुनिया ,
औरत ने नाप रखी है
इस दुनिया से उस दुनिया की दुरी ;

उसे मालूम है
दाल में नमक की मात्रा ,
चाय में चीनी की ,
और बिटिया के कलम में भरे स्याही का नाप भी ;

उसे नाप है मायके में
अपनी मर्यादा का,
और ससुराल में घुँघट का;
वो जानती है
साड़ी के आँचल की लंबाई कितनी होनी चाहिऐ
और बिटिया के स्कर्ट की कितनी;

वो नापा करती है अक्सर
एक ही कदम में अपना संसार ;
सुबह नापती है लंबे लंबे कदम से दफ्तर का रास्ता ,
शाम नापती है और लंबे कदम
अंधेरा होने से पहले पहूँचना है उसे घर ;

नाप रखती है वो ,
कौन कितना पास आ सकता उनके ,
और कौन कितना दूर जा सकता उनसे ;

उसे नाप है
रिश्तों में मौजूद गर्माहट का ,
वो याद रखती है
भाई की पीठ का माप ,
भाभी की कलाई की माप ,
माँ की बिंदी का नाप ,
पिताजी के कुरते का नाप ;

बच्चे की दूध की गर्माहट
कितनी होगी से लेकर ,
बुढे सास ससूर को कितनी दवाई पिलानी है
तक का माप याद है उसे;

औरतें ने अपने दर्द को जरा कम नापा है,
अपनी जरूरतों को भी ,
अपने पैर में पड़े मोच को भी ,
तपते बुखार को भी ;

उन्होंने नाप रखी है अपनी चारदिवारी
अपना आंगन ,
नाप रखे हैं बोलने के शब्द भी ,
हँसने की आवाज भी ,
नाप रखी है उन्होंने रोने का वक्त भी ,
और सोने का भी ;

औरतें नाप लेती हैं,
कमोबेस सबकुछ।
अपनी जिंदगी भी ।

#मनिषाझा

राज दरभंगा- एक गौरवशाली इतिहास

राज दरभंगा कैसे अस्तित्व में आया ?

दरभंगा का इतिहास हमेशा से गौरवशाली रहा है । दरभंगा , मिथिला(तिरहुत) क्षेत्र का एक बहुत अहम हिस्सा रहा है ।
दरभंगा राज , जिसे हम राज दरभंगा के नाम से जानते हैं , खंडवाला वंश के शासक थे ।
हिन्दुस्तान में तुगलक वंश के शासन काल में , मुहम्मद बिन तुगलक ने बिहार में काफी लूट मचाई थी । तब से लेकर मुगल वंश के शासन काल तक दरभंगा की स्थिति गंभीर बनी रही । लेकिन अकबर के शासन काल में दरभंगा का उदय हुआ । शहंशाह अकबर ने यह पाया कि मिथिला क्षेत्र से कर वसुलने के लिऐ एक सही शासन व्यवस्था की जरूरत होगी । अकबर यह जानते थे कि मिथिला क्षेत्र के लिऐ एक मैथिल शासक ही उपयुक्त होगा । और इसलिऐ उन्होंने इस कार्य के लिऐ राजपंडित चंद्रपति ठाकुर (जो मिथिला से थे ) को बुलाकर अपने एक पुत्र को यह काम सौंपने को कहा । राजपंडित ने यह कार्य अपने बड़े पुत्र महेष ठाकुर जी को सौंपना उपयुक्त समझा और अकबर ने सन् 1577 ई° में राम नवमी के दिन महेष ठाकुर जी को मिथिला का राजा बनाया । और यही खंडवाला वंश के शासक राज दरभंगा के नाम से विख्यात हुऐ ।
दरभंगा राज एक अत्यंत प्रभूताशाली राज रहा । इस राज के अंत तक , 4500 गाँव इसमें शामिल थे ।
आजादी के बाद , नये संविधान की रचना की गई और ऐसे सभी राज, रियासतों से सारी शक्तियाँ छीन ली गई । इस राज के अंतिम राजा , महाराजा बहादूर कामेश्वर सिँह थे, जिनकी मृत्यु 1960 में हो गई ।

राज दरभंगा के शासक

दरभंगा राज में कुल 20 शासक हुऐ
1● राजा महेश ठाकुर
2● राजा खोपाल ठाकुर
3● राजा परमानंद ठाकुर
4● राजा शुभंकर ठाकुर
5● राजा पुरुषोत्तम ठाकुर(1607-1623 ई)
6● राजा नारायण ठाकुर(1623-1642 ई)
7● राजा सुंदर ठाकुर(1642-1662ई)
8● राजा महिनाथ ठाकुर(1662-1684 ई)
9● राजा निर्पत ठाकुर(1684-1700 ई)
10● राजा रघु सिंह(1700-1736ई )
11● राजा विष्णु सिंह(1736-1740ई )
12● राजा नरेंद्र सिंह(1740-1760 ई)
13● राजा प्रताप सिंह(1760-1776ई)
14● राजा माधो सिंह(1776-1808ई)
15● महाराजा छत्र सिंह बहादुर(1808-1839ई )
16● महाराजा रूद्र सिंह बहादुर(1839-1850 ई)
17● महाराजा महेश्वर सिंह बहादुर(1850-1860ई)
18● महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर(1860-1898ई)
19● महाराजा रामेश्वर सिंह बहादुर(1898-1929ई)
20● महाराजा कामेश्वर सिँह बहादुर (1929-देश की स्वतंत्रता 1947 तक)

(चित्र इंटरनेट से ली गई है )

राज दरभंगा से जुड़े रोचक तथ्य

1● खंडवाला वंश के हिस्से मिथिला क्षेत्र की सत्ता आने पर इसकी राजधानी मधुबनी में थी; मगर राजा प्रताप सिंह ने 1762 में दरभंगा को अपनी राजधानी बनाया और किले का निर्माण कराया।
2● महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर पहले राजा थे जिन्होंने विदेशी पढ़ाई की थी । ब्रिटिश चेस्टर मैक्नाॅटन , उनके शिक्षक थे । उन्हें knight grand commander की उपाधि मिली थी ।
3● महाराजा रामेश्वर सिंह बहादुर ने ब्रिटिश से महाराजाधिराज की उपाधि हासिल की थी ।ये शक्ति के परम उपासक एवं तंत्र विद्या के ज्ञाता थे । उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा के तहत 1878 में मैजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया था , परंतु वह अपनी पूजा पाठ को लेकर इतने प्रतिबद्ध थे कि वह उस नौकरी में समय नहीं दे पाते थे और उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी ।
4● महाराजा रामेश्वर सिंह बहादुर इतने सिद्ध तांत्रिक थे कि उनकी चिताभूमि पर बनाई गई देवी काली का मंदिर अत्यंत भव्य एवं प्रसिद्ध है , लोगों की ऐसी मान्यता है कि आज भी वहाँ एक खास जगह चिंता की ताप को महसूस किया जा सकता है ।

( श्यामा काली मंदिर , दरभंगा

तस्वीर स्वयं मनिषा झा ने ली है )

5● महाराजा कामेश्वर सिँह बहादुर ने पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किऐ।
इन्होंने न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन प्राईवेट लिमिटेड की स्थापना की । अंग्रेजी में द इंडियन, हिंदी में आर्यावर्त , मैथिली में मिथिला मिहिर का प्रकाशन किया
6● महाराजा कामेश्वर सिँह बहादुर विधान सभा व विधान परिषद के सदस्य भी रहे और 1952-1958 और 1960-1962 तक राज्य सभा के सदस्य भी रहे ।
7●राज दरभंगा ने अपने शासन काल में बनाये हुऐ अनेक भवनों को दान कर दिया ।
जिसमें से नरगौना पैलेस, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय को दिया गया और लक्ष्मीनिवास पैलेस, कामेश्वर सिँह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय को दान में दिया गया ।

(तस्वीर मनिषा झा ने स्वयं ली है )

(तस्वीर मनिषा झा ने स्वयं ली है )

8● कामेश्वर सिँह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय का नाम महाराजा कामेश्वर सिँह बहादुर के नाम पर ही पड़ा ।
9● महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर 1885 में इंडियन नेसनल कांग्रेस के संस्थापको में से एक थे ।
10● राज दरभंगा भगवान शिव और देवी काली के उपासक थे और उन्होंने कई जगह इनके मंदिर निर्माण भी करवाऐ।

(उपर्युक्त दोनों तस्वीर श्यामा काली मंदिर परिसर दरभंगा की हैं , तस्वीर स्वयं मनिषा झा ने ली है )

11● राज दरभंगा ने कई शैक्षणिक संस्थानों को भी दान दिया था । इनमें, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, कामेश्वर सिँह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा मेडिकल काॅलेज , ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, अलिगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय सहित अन्य कई विश्वविद्यालय शामिल हैं ।
महाराजा रामेश्वर सिंह बहादुर ने 5,000,000 रू बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु दान दिया था ।
12● महाराजा कामेश्वर सिँह बहादुर, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे ।
13● राज दरभंगा ने अपना नवलखा पैलेस , पटना विश्वविद्यालय तथा अपना पैतृक आवास आनन्द बाग पैलेस, कामेश्वर सिँह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय को दान दे दिया ।
14● दरभंगा राज संगीत व कला के भी प्रेमी थे ।
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ दरभंगा राज दरबार में प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे , बनारस से पहले उनका जीवन दरभंगा में ही बीता ।
इनके अलावा गौहर जान , पंडित राम चतुर मलिक , पंडित राम सिया तिवारी, मुरादाबाद अली खान इत्यादि भी दरभंगा राज दरबार का हिस्सा थे ।
15● राज दरभंगा द्वारा निर्मित नरगौना पैलेस देश का पहला भूकंपरोधी भवध है ।

-मनिषाझा

अधेड़ ईश्क

आधा बच्चा मन है
कविताओं में उसने रंग भरे हैं
पत्तोँ पर तुम्हारा नाम लिखा है ;
अभी चाँद घट गया है
बुनती है रोज थोड़ा चाँद
गोल करने को फिर से
किनारी सिल देगी अबकी बार
चाँद फिर से उघड़ने न पाऐ ;
उसी नदी के किनारे रहेगी
जहाँ तुम रहते हो
धारा उलट जाती तो अच्छा होता ;
होठों पर बनी चाप को
और थोड़ा खिँचती है
ताकि कम हो सके
तुम्हारे माथे पर खिंची लकीरें;
सफेद से रिश्ते
बिना कोई रंग मिलाऐ
धीमी आँच पर पकाती है;
आधा पका मन है
हरे रंग को छोड़ता
पीला होने को आतुर
धूप माँगती है थोड़ा सा;
उंगली से काजल पोंछती है
अब बिंदी लगाती है
दोपहर का सूरज माथे पर है
ईश्क उसका है अधेड़ ।

#मनिषाझा