अधेड़ ईश्क

आधा बच्चा मन है
कविताओं में उसने रंग भरे हैं
पत्तोँ पर तुम्हारा नाम लिखा है ;
अभी चाँद घट गया है
बुनती है रोज थोड़ा चाँद
गोल करने को फिर से
किनारी सिल देगी अबकी बार
चाँद फिर से उघड़ने न पाऐ ;
उसी नदी के किनारे रहेगी
जहाँ तुम रहते हो
धारा उलट जाती तो अच्छा होता ;
होठों पर बनी चाप को
और थोड़ा खिँचती है
ताकि कम हो सके
तुम्हारे माथे पर खिंची लकीरें;
सफेद से रिश्ते
बिना कोई रंग मिलाऐ
धीमी आँच पर पकाती है;
आधा पका मन है
हरे रंग को छोड़ता
पीला होने को आतुर
धूप माँगती है थोड़ा सा;
उंगली से काजल पोंछती है
अब बिंदी लगाती है
दोपहर का सूरज माथे पर है
ईश्क उसका है अधेड़ ।

#मनिषाझा

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नेवर कंपेयर

हे पुरूष ! तुम ने आज हर क्षेत्र में अपने पांव पसार लिए हैं ।पठन पाठन/ शिक्षण से लेकर राजनीति तक, खेलकूद से लेकर अभिनय तक, युद्ध क्षेत्र से लेकर अंतरिक्ष यात्रा तक हर क्षेत्र में तुमने अपने झंडे गाड़े हैं। हम उस पौरूष शक्ति का बखान करने में असमर्थ हैं , जिसने हर दिन अपना परिचय स्वयं ही दिया है । आज पुरूष महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने लगे हैं । दफ्तर के काम काज से लेकर रसोई में पाककला , किसी भी क्षेत्र में वह महिलाओं से पीछे नहीं है ।
समस्त पुरूषों को इस सफलता की बधाई ।

ऊपर लिखी पंक्तियां आपको अटपटी लगी होंगी पुरुषों को तो यह अपमानजनक भी लगा होगा।
माफ कीजिएगा यहां मैं किसी का अपमान नहीं कर रही परंतु आज आप सब यही कर रहे हैं । तो सोचिए महिलाओं को कैसा महसूस होता होगा जब आप इसी तरह उनकी उपलब्धियां गिनाते हैं , उन्हें बधाई देते हैं.

आप महिलाओं को बधाई देते हैं कि उसने हर क्षेत्र में सफलता हासिल कर ली है ।मगर इसमें बधाई देने वाली कौन सी बात है? वह सफलता हासिल क्यों नहीं कर सकती ? क्या आप उसे इतना कमजोर मानते हैं कि आज अगर महिलाऐं हर क्षेत्र में सफल हो रही हैं तो आपको आश्चर्य हो रहा है ? और अगर आप महिलाओं को इन सफलताओं की बधाई देते हैं तो समस्त पुरूष जाति को भी बधाई ।

सबसे हास्यास्पद तो यह है कि कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो महिलाओं को बधाई देते हैं कि वो एक बेटी है , एक पत्नी है , एक माँ है । मगर यह तो जाहिर सी बात है कि स्त्रीलिंग रिश्तों में एक स्त्री ही हो सकती है । आप क्या चाहते हैं कि आप एक पुरूष होकर किसी की पत्नी बनें । और अगर आप एक स्त्री को बेटी , पत्नी , माँ होने की बधाई देते हैं तो आप सभी पुरूषों को भी बधाई है कि वो पुल्लिंग है।

महिलाओं को बधाईयाँ दी जा रही हैं कि वो किसी को जन्म देती हैं । मगर क्या यह महिलाओं की उपलब्धि है? ईश्वर ने महिलाओं की शारीरिक संरचना ही ऐसे की है कि वह 9 महिने अपनी कोख में शिशु को पाल सके , किन्तु किसी को जन्म देना महिला के अकेले बस में नहीं । प्रजनन में स्त्री पुरूष दोनों भागीदार होते हैं । तो पुरूषों को भी इस कार्य को करने की क्षमता रखने के लिऐ बधाईयाँ मिलनी चाहिऐ ?

महिलाओं को हम किस उपलब्धि की बधाईयाँ देते हैं ? महिलाऐं खुद किस गुमान में हैं ? जो कुछ भी आज महिलाऐं कर के दिखा रही हैं जिन्हें लोग नारी शक्ति कहते हैं ये सारी शक्तियाँ उस नारी में ईश्वर द्वारा ही प्रदान की गई हैं। हर नर नारी ये सारे काम करने में हमेशा से सक्षम रहे हैं । आगे वह और भी विविध क्षेत्र में कार्य करेंगे जिसकी कल्पना भी हम मनुष्य अभी नहीं कर सकते हैं ।

आज एक स्त्री यदि घर के साथ दफ्तर भी संभालती है, अगर आज वो अपने पैरों पर खड़ी है, अगर आज वो एक मां होने के साथ-साथ एक पिता होने का दायित्व भी उठा लेती है ,तो इसमें यह कतई नहीं है कि वह पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला रही है। बल्की ऐसा इसलिए है कि उसे आज आवश्यकता है, उसे आवश्यकता है कि आज वह अकेले ही सब संभाल पाए । मैं पूछती हूं आज कोई पुरुष यदि अकेला रहे ; घर में स्त्री के ना होने से, क्या वह भूखा ही रहेगा ? या जरूरत पड़ने पर वह खुद से खाना पकाएगा ? यदि एक पुरुष लैपटॉप पर उंगलियां चलाने के साथ-साथ, दफ्तर में कलम चलाने के साथ-साथ कुकर की सीटी लगाना भी जानता है कढ़ाई और कलछुल पकड़ना भी जानता है ; तो क्या एक महिला जरूरत पड़ने पर रसोई के साथ दफ्तर नहीं संभाल सकती? इसके लिए किस बात की बधाई?

यदि हम सचमुच महिला का सम्मान करते हैं तो बार-बार उसकी तुलना पुरुषों से क्यों की जाती है ? स्त्री पुरुष दोनों ईश्वर द्वारा बनाए गए हैं दोनों ही अपने आप में अलौकिक रचनाएँ हैं , दोनों की तुलना व्यर्थ है। माना कि दोनों की शारीरिक संरचना अलग-अलग है मगर यह उसकी ताकत है उसकी खुबसूरती है, कमजोरी नहीं।

महिला का सम्मान करने के लिए उसके गुणों का बखान करने की जरूरत नहीं है, उसे लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा -काली जैसी देवी कहने की जरूरत नहीं है, उसे विशेष स्थान प्रदान करने की जरूरत नहीं है, उसे आरक्षण प्रदान करने की जरूरत नहीं है, महिलाओं को पुरुषों जैसा बनाने की जरूरत नहीं है। महिलाएं इंसान है , महिलाओं के साथ इंसान जैसा बर्ताव किया जाए , महिलाएं महिलाएं है उन्हें महिलाएं ही बने रहने दे। और जिस दिन हम सभी यह बात समझ जाएंगे उस दिन शायद महिला दिवस मनाने की ज़रूरत भी ना पड़े.

#मनिषाझा

धूल चाटता संविधान

26 जनवरी, भारत का गणतंत्र दिवस इस साल भी बहुत ही धूम-धाम से मनाया गया। एक दो दिन पहले से ही बाजारें सज चुकी थी; हर गली गली तिरंगे की दूकानें सजी थी और कई लोग तिरंगे खरीद रहे थे। 26 जनवरी ,गणतंत्र दिवस के दिन वही तिरंगा आसमान छू रहा था । काफी सम्मान का क्षण होता है वह नजारा। और 27 जनवरी को, पूरी सडके तिरंगे से पटी हुई नजर आई । बहुत दुख होता है यह देख कर । देश का सम्मान पैरों तले कुचला जा रहा होता है। वही तिरंगा कहीं लोगों के पैरों तले , तो कभी कचरों के ढेर में नजर आता है । यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है इस देश के लिऐ ।लेकिन आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या यह जरूरी है कि हर बच्चे तिरंगे के हाथ में तिरंगा हो? क्या यह जरूरी है कि हर कोई उस दिन तिरंगा खरीदे? हम माने या न माने तिरंगा हमारे देश की पहचान है, हमारा सम्मान है, हमारी आबरू है और इसे हम इतना सार्वजनिक क्यों बनाकर रखते हैं की हर कोई इसे खरीद सकता है , कहीं भी कैसे भी सजा देता है और अगले ही दिन इसे सड़क पर फेंक देता है? मैं उन अभिभावकों से पुछना चाहूँगी जो अपने उन 4-5 साल के बच्चों के हाथ में कागज और प्लास्टिक के बने तिरंगे थमा देते हैं जिन्हें यह तक मालूम नहीं होता कि इस तिरंगे का क्या महत्व है ; और फिर छोड देते हैं उस तिरंगे को धूल चाटने के लिऐ -क्या देश का तिरंगा एक खिलौना है जिसे आपने बच्चे के हाथों नष्ट होने छोड दिया ? हम इस बात को ले कर इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं ?प्रशासन भी इस बात पर ध्यान क्यूँ नहीं देती? एक कानून क्यों नहीं बना दिया जाता इस के लिऐ? अगर हर किसी को तिरंगा ही चाहिए तो सरकार उसके लिए एक लाइसेंस /रेजिस्ट्रेसन नंबर क्यों नहीं जारी कर देती है हर किसी के पास एक रजिस्टर्ड तिरंगा हो जिसे यदि क्षत-विक्षत स्थिति में पाया जाता है तो उस व्यक्ति पर कारवाई की जाए। अगर हम सब कोशिश करें तो यह इतना भी मुश्किल तो नहीं है। मेरी आप सब से एक ही निवेदन है तिरंगे का सम्मान करें , दूसरों को भी सिखाऐं । तिरंगे का सम्मान हमारा सम्मान है ।

#मनिषाझा

वसंत पंचमी

मुझे अपनी दादी -नानी से काफी कुछ सीखने-समझने मिला है । मेरी दादी वसंत पंचमी को श्री पंचमी कहा करती है। मेरे पुछने पर उन्होंने बताया कि “श्री ” अर्थात लक्ष्मी । और वसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती की पूजा कि जाती है और ऐसा माना जाता है कि माँ सरस्वती की कृपा से ही हमें विद्या बुद्धि की प्राप्ति होती है । और जहाँ सरस्वती का निवास होगा वहाँ स्वतः लक्ष्मी का वास होगा । अर्थात जिसके पास विद्या होती है बुद्धि होती है वह मनुष्य मान सम्मान के साथ साथ धन -संपत्ति का भी हकदार होता है ।
माँ लक्ष्मी की कृपा पाने के लिऐ माँ सरस्वती की कृपा बनी रहनी आवश्यक है । 😊

#dadimasaid
#मनिषाझा

कविता

हर तारे को चमकने के लिए अंधकार की जरूरत होती है

कोई कितना ही बड़ा हो जाए उसे प्यार की जरूरत होती है
पर जाती हैं दरारें कभी जमीं में भी,

फटता है उसका भी कलेजा कभी

तब उसकी आग बुझाने को बौछार की जरूरत होती है…

कोई कितना भी बड़ा हो जाऐ उसे प्यार की जरूरत होती है।

#मनिषाझा